दशरथ द्वारा बनाया गया शनिदेव का स्तवन
शनिदेव की साढ़े साती और ढैया से बचने के लिए पढ़ें ये स्तोत्र, कभी नहीं होंगे परेशान। महाराजा दशरथ ने लिखा था ये, हुआ भरपूर लाभ।

दशरथकृत शनैश्चरस्तोत्र
॥ अथ दशरथकृतशनैश्चरस्तोत्रम् ॥
ॐ अस्य श्रीशनैश्चरस्तोत्रमन्त्रस्य दशरथ ऋषिस्त्रिष्टुप्छन्दः श्रीशनैश्चरो देवता शनैश्चरप्रीत्यर्थे पाठे विनियोगः।
दशरथ उवाच
कोणोЅन्तको रौद्रयमोЅथ बभ्रुः, कृष्णः शनिः पिङ्गलमन्दसौरिः ।
नित्यं स्मृतो यो हरते च पीडां, तस्मै नमः श्रीरविनन्दनाय ॥१॥
महाराज दशरथ बोले- ‘‘कोण, अन्तक, रौद्र, यम, बभ्रु, कृष्ण, शनि, मन्द, सौरि’’ (भगवान् शनि के इन नामों ) का नित्य स्मरण करने पर जो कष्ट को हर लेते हैं, उन सूर्यपुत्र शनिदेव को नमस्कार है।
सुराЅसुराः किंपुरुषोरगेन्द्रा गन्धर्वविद्याधरपन्नगाश्च ।
पीड्यन्ति सर्वे विषमस्थितेन तस्मै नमः श्रीरविनन्दनाय ॥२॥
‘‘सुर, असुर, किन्नर, सर्पराज, गन्धर्व, विद्याधर, वासुकी आदि नाग’’ (ये) सभी (जिनके) विपरीत होने पर पीड़ित होते हैं, उन सूर्यपुत्र शनिदेव को नमस्कार है।
नरा नरेन्द्राः पशवो मृगेन्द्रा वन्याश्च ये कीटपतङ्गभृंङ्गाः ।
पीड्यन्ति सर्वे विषमस्थितेन तस्मै नमः श्रीरविनन्दनाय ॥३॥
‘‘मनुष्य, राजा, पशु, सिंह और जो जंगली कीड़े, पतंगे, भौंरे आदि’’ हैं (ये) सभी (जिनके) विपरीत होने पर पीड़ित होते हैं, उन सूर्यपुत्र शनिदेव को नमस्कार है।
देशाश्च दुर्गाणि वनानि यत्र सेनानिवेशाः पुरपत्तनानि ।
पीड्यन्ति सर्वे विषमस्थितेन तस्मै नमः श्रीरविनन्दनाय ॥४॥
‘‘देश, किले, वन, सेना की छावनियाँ, नगर, महानगर’’ (ये) सभी (जिनके) विपरीत होने पर पीड़ित होते हैं, उन सूर्यपुत्र शनिदेव को नमस्कार है।
तिलैर्यवैर्माषगुडान्नदानैर्लोहेननीलाम्बरदानतो वा ।
प्रीणाति मन्त्रैर्निजवासरे च तस्मै नमः श्रीरविनन्दनाय ॥५॥
‘‘तिल, जौं, उड़द, गुड़ और अनाज के दान से, अथवा लोहा और नीले (काले) वस्त्र के दान से, एवं मन्त्रों और अपने वार (शनिवार)’’ से जो प्रसन्न हो जाते हैं, उन सूर्यपुत्र शनिदेव को नमस्कार है।
प्रयागकूले यमुनातटे च सरस्वतीपुण्यजले गुहायाम् ।
यो योगिनां ध्यानगतोЅपि सूक्ष्मस्तस्मै नमः श्रीरविनन्दनाय ॥६॥
प्रयाग में (गंगा) तट पर, यमुना के तट पर, सरस्वती के पावन जल में, गुफा में, जो सूक्ष्म रूप हो योगियों के ध्यान में आते हैं, उन सूर्यपुत्र शनिदेव को नमस्कार है।
अन्यप्रदेशात् स्वगृहं प्रविष्टस्तदीयवारे सः नरः सुखी स्यात् ।
गृहाद्गतो यो न पुनः प्रयाति तस्मै नमः श्रीरविनन्दनाय ॥७॥
अन्य स्थान से जो जिनके वार (शनिवार) के दिन अपने घर में प्रवेश करता है, वह मनुष्य सुखी होता है और जो (जिनके वार शनिवार के दिन अपने) घर से प्रस्थान करता है, वह पुनः लौटकर नहीं आता, उन सूर्यपुत्र शनिदेव को नमस्कार है।
स्रष्टा स्वयम्भूर्भुवनत्रयस्य त्राता हरिः संहरते पिनाकी ।
एकस्त्रिधा ऋग्यजुःसाममूर्तिस्तस्मै नमः श्रीरविनन्दनाय ॥८॥
(जो शनिदेव ही) सृष्टिकर्ता ब्रह्मा, तीनों लोकों के रक्षक विष्णु, संहारक शिव (हैं)। जो एक ही ऋग्वेद, यजुर्वेद, सामवेद स्वरूप हैं, उन सूर्यपुत्र शनिदेव को नमस्कार है।
शन्यष्टकं यः प्रयतः प्रभाते नित्यं सपुत्रैः पशुबान्धवैश्च ।
पठेच्च सौख्यं भुवि भोगयुक्तं प्राप्नोति निर्वाणपदं परं सः ॥९॥
जो प्रतिदिन प्रातःकाल प्रयत्नपूर्वक पुत्रों, पशुओं और बान्धवों सहित इस शनिदेव के अष्टक को पढ़ता है, वह इस पृथ्वी पर सभी भोगों से युक्त सुख को प्राप्त करता है और अन्त में मोक्ष पद को पाता है।
कोणस्थः पिंगलो बभ्रुः कृष्णो रौद्रोЅन्तको यमः ।
सौरिः शनैश्चरो मन्दः पिप्पलादेन संस्तुतः ॥१०॥
एतानि दश नामानि प्रातरुत्थाय यः पठेत् ।
शनैश्चरकृता पीडा न कदाचिद् भविष्यति ॥११॥
पिप्पलाद ऋषि द्वारा स्तुति मे कहे ‘‘कोणस्थ, पिंगल, बभ्रु, कृष्ण, रौद्र, अन्तक, यम, सौरि, शनैश्चर, मन्द’’, इन दस नामों को प्रातःकाल उठकर जो व्यक्ति पढ़े, उसे शनिदेव द्वारा दी जाने वाली पीड़ा कभी नहीं होगी।
॥ इति श्रीदशरथकृतशनैश्चरस्तोत्रम् ॥
॥ यह श्रीदशरथजी द्वारा रचित शनैश्चर स्तोत्रम् का हिन्दी सरलार्थ पूर्ण हुआ ॥
अनुवादक : बाल किशन शास्त्री
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