आरती भगवान् परशुराम जी की
जय भृगुनन्दन दुष्टनिकन्दन जन जन हितकारी।
वीर तपस्वी हे ओजस्वी जीवन सुखकारी॥टेर॥
पिता तुम्हारे ऋषि जमदग्नि सती रेणुका माता।
दिया ऋचिक ऋषि ने वर तुम बने वीर विख्याता॥
चारों युग प्रताप तुम्हारा, तेजपुञ्ज बलधारी।
जय भृगुनन्दन दुष्टनिकन्दन जन जन हितकारी॥१॥
शीश जटा मुख तेज छटा अरु कण्ठ माल साजे।
कटि मृगच्छाला वक्ष विशाला तिलक भाल राजे॥
एक हाथ में परशु तुम्हारे कांधे पर धनुधारी।
जय भृगुनन्दन दुष्टनिकन्दन जन जन हितकारी॥२॥
कार्तवीर्य अर्जुन राजा ने कामधेनु थी चुराई।
हने तपस्या मग्न महामुनि दीन प्रजा थी लुटवाई॥
ऐसे धर्मविरोधी मारे धरती थी उद्धारी।
जय भृगुनन्दन दुष्टनिकन्दन जन जन हितकारी॥३॥
दिव्य धनुष दे रामचन्द्र का बल त्रेता में बढ़ाया।
कृष्ण संग द्वापर में कौरव पाण्डव को समझाया॥
कलियुग में हिमगिरि के ऊपर करते हो तप भारी।
जय भृगुनन्दन दुष्टनिकन्दन जन जन हितकारी॥४॥
ऋषियों ने वरदान दिया जो दर्श तुम्हारा पावे।
ऋद्धि सिद्धि कुलवृद्धि उन घर विपद् न आने पावे॥
मिटे दीनता बढ़े मनोबल पुण्यलाभ हो भारी।
जय भृगुनन्दन दुष्टनिकन्दन जन जन हितकारी॥५॥
परशुराम बलधाम तुम्हारी आरती जो कोई गावे।
सफल मनोरथ होवे उसका वांछित फल पावे॥
रक्षक तुम हो सदा हमारे हम हैं शरण तुम्हारी।
जय भृगुनन्दन दुष्टनिकन्दन जन जन हितकारी॥६॥
[…] आरती भगवान् परशुराम जी की दूसरी आरती […]