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parshuram chalisa
भगवान् परशुराम

भगवान् परशुराम चालीसा

📅 March 30, 2026 🕐 1 min read 💬 1 comment

वन्देहुँ भृगुकुल कमल पतंगा। सदा रहत निज जन के संगा॥१॥

दयासिन्धु करुणाकर स्वामी। तुम घट घट के अन्तरयामी॥२॥

ऋषि जमदग्नि पिता तुम्हारे। मात रेणुका के तुम प्यारे॥३॥

शीश जटा मुख तेज विराजे। अरु त्रिपुण्ड मस्तक पर साजे॥४॥

रुद्र माल गल सुन्दर सोहे। वक्ष विशाल वीर मन मोहे॥५॥

ब्रह्मसूत्र कान्धे पर साजे। कटि मृगच्छाल मेखला राजे॥६॥

तेजपुञ्ज पीताम्बर धारी। भक्त जनन के संकट हारी॥७॥

एक हाथ में परशु विराजे। दूजे वेद संहिता साजे॥८॥

प्रबल पाठ अरु शर धनु सोहे। प्रलयंकर शंकर मन मोहे॥९ ॥

शास्त्र शस्त्र अधिकार समाना। हो समर्थ तुम कृपा निधाना॥१0॥

दम्भदलन सज्जन सुखदाता। भूमण्डल के भाग्यविधाता॥११॥

चारों वेदों के तुम ज्ञाता। चार पदार्थ के तुम दाता॥१2॥

चारों युग प्रताप समाना। अजर अमर तुम हे भगवाना॥१३॥

कार्तवीर्य अर्जुन हङ्कारी। भा विधि वाम गई मति मारी॥१४॥

तपोनिष्ठ जमदग्नि जानी। तिनसे की उसने मनमानी॥१५॥

हारा रण निज सैन्य नसाई। कामधेनु तब लेय चुराई॥१६॥

महर्षि बैठे ध्यान लगाई। खल पुत्रों ने तेग चलाई॥१७॥

ऐसे धर्म विरोधी मारे। सुर मुनिजन प्रभु तुम उद्धारे॥१८॥

त्रेता युग में हे भगवाना। शिवधनु भंग हुआ तुम जाना॥१९ ॥

छोड़ तपस्या दौड़े आए। गुरु धनुभंजक मारण धाए॥२0॥

राम कहा धनु भंजन हारा। दशरथसुत मैं दास तुम्हारा॥२१॥

रामविनय सुनि तुम हर्षाये। खिंचवा धनुष राम पतवारे॥२२॥

परमपुरुष अवतारी चिह्ना। वैष्णव धनुष राम कह दीह्ना॥२३॥

ब्रह्मतेज गहि जोड़े हाथा। तब आशीष जीते रघुनाथा॥२४॥

चिरंजीव द्वापर में आके। योग्य शिष्य द्रोणादि पाके॥२५॥

राम तुम्ही ने शिक्षा दीन्ही। भीष्म कर्ण सभी ने लीन्ही॥२६॥

वेदपाठ कर मुनिजन साथा। कीन्हा तिलक युधिष्ठिर माथा॥२७॥

कश्यप ऋषि की आज्ञा पाके। गिरि महेन्द्र के ऊपर जाके॥२८॥

कलियुग में सिद्धासन पाके। बैठे प्रभु का ध्यान लगाके॥२९ ॥

इक्किश बार भार भुवि तारा। जनद्रोही क्षत्रप संहारा॥३0॥

दशरथ जनक समान उभारे। सज्जन से नहीं बैर तुम्हारे॥३१॥

चारों वर्ण समान तुम्हारे। सबके रक्षक पालन हारे॥३२॥

बालक युवा वृद्ध अरु नारी। जो कोई आवे शरण तुम्हारी॥३३॥

लेत लाभ जीवन सुख राशि। देते तुम कल्पान्त निवासी॥३४॥

कर पितु मात प्रसन्न गुसाईं। अष्टसिद्धि पावा तुम साईं॥३५॥

ऋषिजन की तुम रक्षा कीन्ही। सबने मिलकर आयसु दीन्ही॥३६॥

परशुराम प्रभु को जो ध्यावे। ऋद्धि सिद्धि कुलवृद्धि पावे॥३७॥

जो यह चालीसा नित गावे। तेहि घर सकल सम्पदा आवे॥३८॥

बार बार ‘बदरी’ यह भाखे। निज जन की प्रभु लज्जा राखे॥३९ ॥

जो यह विरुदावली सुनावे। विद्या पढ़ विद्वान कहावे॥४0॥

दोहा

भृगुनन्दन दुःखभंजना, आयो शरण तिहारी।

करहू कृपा कलिमलदहन, लिज्यो खबर हमारी॥

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Whenever there is a decline of righteousness and a rise of unrighteousness, I manifest myself. For the protection of the good and the establishment of dharma, I am born age after age.

— Bhagavad Gita, Chapter 4, Verse 7–8